मोहब्बत और धर्म
क्या मैं और तुम हम नहीं हो सकते, क्या इतना कमज़ोर है हमारे प्रेम की डोर जो केवल धर्म और मज़हब इसे तोड़ने की शक्ति रख सकता है।
क्या हुआ अगर हम दोनों अलग धर्म को मानते हैं, लेकिन एक ऐसा भी मज़हब है जिसे हम दोनों यानी तुम और मैं जानते हैं उसे मानते हैं और एक चीज जो हम दोनों को अलग करने नहीं बल्कि मिलाने की कोशिश करती है, क्या तुम्हें पता है वो इतनी मजबूत चीज जो हमेशा से हार कर भी जीत जाती है, जो धर्म और जात नहीं कुछ और मानता है जैसे मैं और तुम, ख़ैर छोड़ो ना मैं भी कहाँ ज़माने से लड़ने बैठ गया, अरे नहीं मैं तो ज़माने की परवाह कहाँ किया करता था, और अब भी तो मैं नहीं कर रहा।
तो मैं बात कर रहा था प्रेम की हाँ ये वही तो है जो किसी धर्म, सांप्रदाय से मुक्त है, जो किसी जाति के भेद भाव, ऊंच नीच कहाँ जनता है।
ये प्रेम जो गंगाजल जैसा पावन है, इसमें रवानी है।
सुनो ना देखो हवाओं को ऐसे बह रही है जैसे मानो कोई ख्वाब सजा रहा हूँ मैं और उस ख्वाब में हमारी खुशी देख रहा हूँ, अरे उस चाँद को देखो ना कैसे जल रहा है तुम्हें देखकर और जले भी क्यों ना उसकी खूबसूरती को तुम्हारी सादगी से मात जो मिल रही है।
अब ये मत सोचना कि मैंने तुम्हारी खूबसूरती क्यों नहीं कहा क्योंकि ये चाँद तुम्हारी खूबसूरती को अपनी खूबसूरती से कहाँ टक्कर दे पाएगी।
क्या हुआ अगर हम दोनों अलग धर्म को मानते हैं, लेकिन एक ऐसा भी मज़हब है जिसे हम दोनों यानी तुम और मैं जानते हैं उसे मानते हैं और एक चीज जो हम दोनों को अलग करने नहीं बल्कि मिलाने की कोशिश करती है, क्या तुम्हें पता है वो इतनी मजबूत चीज जो हमेशा से हार कर भी जीत जाती है, जो धर्म और जात नहीं कुछ और मानता है जैसे मैं और तुम, ख़ैर छोड़ो ना मैं भी कहाँ ज़माने से लड़ने बैठ गया, अरे नहीं मैं तो ज़माने की परवाह कहाँ किया करता था, और अब भी तो मैं नहीं कर रहा।
तो मैं बात कर रहा था प्रेम की हाँ ये वही तो है जो किसी धर्म, सांप्रदाय से मुक्त है, जो किसी जाति के भेद भाव, ऊंच नीच कहाँ जनता है।
ये प्रेम जो गंगाजल जैसा पावन है, इसमें रवानी है।
सुनो ना देखो हवाओं को ऐसे बह रही है जैसे मानो कोई ख्वाब सजा रहा हूँ मैं और उस ख्वाब में हमारी खुशी देख रहा हूँ, अरे उस चाँद को देखो ना कैसे जल रहा है तुम्हें देखकर और जले भी क्यों ना उसकी खूबसूरती को तुम्हारी सादगी से मात जो मिल रही है।
अब ये मत सोचना कि मैंने तुम्हारी खूबसूरती क्यों नहीं कहा क्योंकि ये चाँद तुम्हारी खूबसूरती को अपनी खूबसूरती से कहाँ टक्कर दे पाएगी।
मैं क्या चाहता हूँ तुम्हें पता है, नहीं ऐसा हो सकता है क्या भला कि मैं तुमसे अलग कुछ और सोच पाऊँ, मैं तो बस तुम्हारे साथ नवरात्र में माता की आरती गाना चाहता हूँ, दीवाली में दिये जलाना चाहता हूँ, उस ईद के चाँद का बेसब्री से तुम्हारे साथ छत पर बैठ तुम्हारे बालों को संवारता हुआ इंतज़ार करना चाहता हूँ और जब चाँद निकलने को राज़ी ना हो मैं तुम्हें देख कर अपनी ईद मनाना चाहता हूँ, हर रोज़े की इफ्तारी में तुम्हारे साथ तुम्हें खिलाना चाहता हूँ और अल्लाह की इबादत में जब तुम सज़दा करो मैं भी तुम्हारे साथ उस अल्लाह से दुआ में अपने हाथ फैलाना चाहता हूँ।
हाँ मैं जानता हूँ मेरी चाहत, मेरी ख्वाहिशें शायद पूरी नहीं हो पाएगी लेकिन ऐसी चाहत रखना क्या गुनाह है और अगर है भी तो क्या, मैं परवाह नहीं करता मैं ज्यादा से ज्यादा गुनाहगार हीं तो कहलाउँगा।
तो बस बात यहीं तक तो सीमित नहीं हो सकती ना क्योंकि प्यार को कहां कोई बंधन में बांध सका है, ये तो अनंत है आकाश की तरह, इसमें गहराई है समुद्र से भी ज्यादा, ये तो प्यार है बस प्यार है जहाँ कोई धर्म आड़े नहीं आ सकता।
सुनो ना बहुत प्यार है तुमसे।।

बहुत ही बढ़िया
ReplyDeleteधन्यवाद्
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