फर्क पड़ता है क्या ?




मेरे होने या ना होने से तुम्हें फर्क पड़ता है क्या,
दिल से चाहा है तुम्हें पर तुमसे कुछ नहीं चाहा पर तुम्हें फर्क पड़ता है क्या,
मैं रोता हूँ तुम्हें याद करके, दिल मेरा इतना नादान है क्या,
तकलीफ मुझे भी होती है जब तुम बात नहीं करती मुझसे पर मेरी तकलीफ तुम्हें दिखती है क्या,
हर रात मैं तारों के झुंड में जब चाँद को तन्हा देखता हूँ, उस चाँद में मुझे बिल्कुल मेरी तरह ही एक बेचैनी नज़र आती है।
हर सुबह मुझे सूरज की किरणों में बिखरी एक आस दिखाई देती है, मगर ना जाने क्यूँ वो बस आस हीं रह जाती है।
मैं चाहता हूँ कि किरणें मुझे साथ साथ अपने साथ बहुत दूर ले चले मगर फिर भी ना जाने क्यूँ वो हर वक़्त मुझे ठुकरा देती है।
इन सारी बातों से तुम्हें ज़रा भी फर्क पड़ता है क्या।
मैं बहुत खुश हूँ ऐसा तुम समझती हो या समझने की कोशिश करती हो, सारे लोग मुझे पागल, दीवाना, आवारा और ना जाने क्या क्या समझ बैठे हैं, जानती हो क्यों, क्योंकि मैं प्यार करता हूँ और सिर्फ़ तुमसे करता हूँ ये कहना हीं बेईमानी होगी मेरे लिए, और मैं खुद से बेईमानी नहीं करना चाहता।
मेरी दुनियाँ में और भी लोग हैं पर शायद तुम बहुत खास हो हाँ मैं सिर्फ़ तुमसे नहीं मेरी ज़िन्दगी से जुड़ी हर शख्स से मोहब्बत करता हूँ, उन लोगों से भी जो मुझे पागल, दीवाना कहते हैं, पर तुम्हें फर्क पड़ता है क्या।
जब भी मैं सफ़र में किसी रेलगाड़ी या बस या कोई और साधन में खिड़की वाली सीट पर बैठ बाहर के नज़ारे जो बहुत खूबसूरत दिखते हैं उन्हे देखने की कोशिश करता हूँ मगर उस वक़्त भी तुम्हारा हीं चेहरा मेरी आँखों में समाया रहता है, और सहसा आँखों से अश्कों की बूँद छलक पड़ते हैं और सारे पुराने किस्से जो हमारे तुम्हारे बीच कभी हुआ करती थी वो दिल में एक दर्द के रूप में उभर कर सामने आ जाता है और मैं चुपचाप हीं बस तुम्हारा नाम लेकर चिल्लाया करता हूँ, पर तुम्हें मेरी बेबसी दिखाई देती है क्या।
लोग पूछते हैं, और ताने देते हैं ऐसे कौन रोता है क्या हुआ तुम इतने परेशान क्यों हो वगैरह मगर मैं उस वक़्त भी चुप रहकर तुम्हारा नाम उनलोगों को नहीं बताता क्योंकि मैं डरता हूँ कि कहीं तुम बदनाम ना हो जाओ।।
पर तुम्हें फर्क पड़ता है क्या।।


हो सके तो लौट आओ वापस,
अब और तन्हा रह नहीं सकता।
काट तो सकता हूँ ज़िन्दगी,
पर बिना तुम्हारे जी नहीं सकता।।


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