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Showing posts from 2018

उम्मीद

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किसी गैर से क्या उम्मीद रखूँ मैं, कुछ अपनों ने दर्द बेशुमार दिया है। हँसी जिसकी मेरे लिए दवा है, रोने का सबब उसने क्या खूब दिया है। रोशन मेरी ज़िन्दगी है जिससे, मोहब्बत के दीये को तेज़ हवा उसी ने दिया है। रात गुलज़ार होती रही जिसके एहसास से, दिन के उजालों को भी उसने अँधेरा किया है। जब इश्क़ है तो है उससे, उसने धर्म बीच में लाकर मुझे शर्मिंदा किया है। जीत जाता मैं भी बाज़ी अपने मोहब्बत की, अय्याशी नहीं मैंने इश्क़ पाकीज़ा किया है। जिस्‍म की भूख नहीं मुझे कभी, दिल का भूखा रोटी से समझौता किया है। आशिक़ तो हूँ मैं तेरी मुस्कान का,  खुश रहो तुम हमेशा ख़ुदा से यही दुआ किया है। ~ सौरभ सुमन ©

सिर्फ वो

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सिर्फ वो जब सबने साथ छोड़ दिया  मोहोब्बत ने भी मुँह मोड़ लिया  उस वक़्त एक दोस्त के रूप मे तू मेरी ज़िंदगी मे आयी मेरी ज़िंदगी तूने सवारी मुझे जीना सिखाया दिल से खुश रहना सिखाया हर एक बात पे  मुझे संभाला है तूने कहने को तोह जी मे उसके आने से पहले भी रही थी पर उसके आने के बाद ज़िन्दगी जीने का तरीका मिला ज़िन्दगी में जीने का एक सलीका मिला पहले जीना फिसूल था अब जीने का एक मकसद मिला यू तोह दोस्त है तू मेरी पर ज़िन्दगी बस्ती है तुझमे मेरी जब सब साथ छोड़ गए मुझे अकेला कर गए उस समय तूने संभाल मुझे एक एक आंसू एक एक आंसू मेरा गिरने से बचाया है तूने जो रात को 10 बजे सो जाती थी वो मेरे लिए पूरी पूरी रात जगके बिताती थी जो चुहिया को देखकर दर जाती है वो मेरे लिए दुनिया से लड़ जाती है मेरी हर बात बोलने से पहले समझती है मेरे हर जज़्बात से अपने ख्वाब बुनती है नही बोलती वो मुझे कुछ बस मुझे हर हाल में खुश रखती है कहते थे लोग नही है मेरे काबिल वो पर आज उन लोगो से ज़्यादा जानती है मुझे वो वो सब तो छोड़ गए साथ बीच सफर में पर ...

एक ग़ज़ल "ये ठीक नहीं है"

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ये ठीक नहीं है, हुस्न संगमरमर, नूर पाकिज़ा उसपर,  हम देखे ना तुम्हें, शिकवा नज़रें झुका के करते हो।  कहते हो आँखें चुरा लूँ तुमसे, ये ठीक नहीं है।। सादगी की बुत, आंखों में हया उसपर,  हम दिल ना हारें, क्यूँ ये सितम करते हो।  कहते हो ज़िद ना करो, ये ठीक नहीं है।। गाल गुलाबी, होठों की लाली उसपर,  हम बहके ना इनपर, नक़ाब ओढ़ के निकलते हो।  कहते हो दिल ना धड़के मेरा, ये ठीक नहीं है।। कानों में बाली, नाक में पिन उसपर,  हम होश ना खोएं, क्यूँ ये सब छुपा के रखते हो।  कहते हो सुनो दुनियाँ की, ये ठीक नहीं है।। खुद इतने ज़ुल्म हर बार मुझपर,  फिर क्यूँ बदनाम मुझे सरे बज़्म करते हो।  कहते हो मोहब्बत नहीं है तुमसे, ये ठीक नहीं है।।  ~ सौरभ सुमन ©
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माँ सच कहते हैं, कि ज़िन्दगी मिलना ना आसान है। और जिसने मुझे ज़िन्दगी दी, हाँ वो मेरी माँ है।। जब पहली बार देखा उसको, उसके चेहरे पे हँसी थी। आंखों में मेरे आँसू थे, और मेरे रूप में उसे बेटी मिली थी।। कितनी मासूम थी मैं, मुझे ना पता था कि माँ क्या होती है? ना हाथ से निवाला उठाया जाता था ना पैरों से खुद चला जाता था। तब माँ की एहमियत का खुद पता चल जाता था, रो तो मैं हर बात पे देती थी पर आँसू पोछने बस उसी का हाथ आता था।। जब बड़ी हुई पता चला रिश्ते बहुत होते हैं दुनिया में, पर सब रिश्ते माँ के बाद ही आते है मेरे लिए इस दुनिया मैं। मेरे रोने पे खुद रो जाती है वो, मेरे मुस्कुराने पे मुस्कुराती है। मेरे बिना वो भी एक पल ना रह पाती है, मैं 2 मिनट भी लेट हो जाऊँ तो टेंशन में आ जाती है। 5 मिनट लेट होते ही मुझे कॉल लगाती है, मेरे इंतज़ार में खाना वो भी नहीं खाती है, सब सो जाते हैं मेरे आने तक, बस एक मेरी माँ ही होती है जिसे नींद नहीं आती है।। मैंने माँ को बहुत तकलीफ दी है, पर उसके बिना एक लम्हा भी बिताना भारी सा लगता है। हाँ ..लड़ती हूँ मैं उनसे, हर बात पे हक भी जताती...

फर्क पड़ता है क्या ?

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मेरे होने या ना होने से तुम्हें फर्क पड़ता है क्या, दिल से चाहा है तुम्हें पर तुमसे कुछ नहीं चाहा पर तुम्हें फर्क पड़ता है क्या, मैं रोता हूँ तुम्हें याद करके, दिल मेरा इतना नादान है क्या, तकलीफ मुझे भी होती है जब तुम बात नहीं करती मुझसे पर मेरी तकलीफ तुम्हें दिखती है क्या, हर रात मैं तारों के झुंड में जब चाँद को तन्हा देखता हूँ, उस चाँद में मुझे बिल्कुल मेरी तरह ही एक बेचैनी नज़र आती है। हर सुबह मुझे सूरज की किरणों में बिखरी एक आस दिखाई देती है, मगर ना जाने क्यूँ वो बस आस हीं रह जाती है। मैं चाहता हूँ कि किरणें मुझे साथ साथ अपने साथ बहुत दूर ले चले मगर फिर भी ना जाने क्यूँ वो हर वक़्त मुझे ठुकरा देती है। इन सारी बातों से तुम्हें ज़रा भी फर्क पड़ता है क्या। मैं बहुत खुश हूँ ऐसा तुम समझती हो या समझने की कोशिश करती हो, सारे लोग मुझे पागल, दीवाना, आवारा और ना जाने क्या क्या समझ बैठे हैं, जानती हो क्यों, क्योंकि मैं प्यार करता हूँ और सिर्फ़ तुमसे करता हूँ ये कहना हीं बेईमानी होगी मेरे लिए, और मैं खुद से बेईमानी नहीं करना चाहता। मेरी दुनियाँ में और भी लोग हैं पर शायद तुम बहु...

मोहब्बत और धर्म

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क्या मैं और तुम हम नहीं हो सकते, क्या इतना कमज़ोर है हमारे प्रेम की डोर जो केवल धर्म और मज़हब इसे तोड़ने की शक्ति रख सकता है। क्या हुआ अगर हम दोनों अलग धर्म को मानते हैं, लेकिन एक ऐसा भी मज़हब है जिसे हम दोनों यानी तुम और मैं जानते हैं उसे मानते हैं और एक चीज जो हम दोनों को अलग करने नहीं बल्कि मिलाने की कोशिश करती है, क्या तुम्हें पता है वो इतनी मजबूत चीज जो हमेशा से हार कर भी जीत जाती है, जो धर्म और जात नहीं कुछ और मानता है जैसे मैं और तुम, ख़ैर छोड़ो ना मैं भी कहाँ ज़माने से लड़ने बैठ गया, अरे नहीं मैं तो ज़माने की परवाह कहाँ किया करता था, और अब भी तो मैं नहीं कर रहा। तो मैं बात कर रहा था प्रेम की हाँ ये वही तो है जो किसी धर्म, सांप्रदाय से मुक्त है, जो किसी जाति के भेद भाव, ऊंच नीच कहाँ जनता है। ये प्रेम जो गंगाजल जैसा पावन है, इसमें रवानी है। सुनो ना देखो हवाओं को ऐसे बह रही है जैसे मानो कोई ख्वाब सजा रहा हूँ मैं और उस ख्वाब में हमारी खुशी देख रहा हूँ, अरे उस चाँद को देखो ना कैसे जल रहा है तुम्हें देखकर और जले भी क्यों ना उसकी खूबसूरती को तुम्हारी सादगी से मात जो मिल रही ...