उम्मीद




किसी गैर से क्या उम्मीद रखूँ मैं,
कुछ अपनों ने दर्द बेशुमार दिया है।

हँसी जिसकी मेरे लिए दवा है,
रोने का सबब उसने क्या खूब दिया है।

रोशन मेरी ज़िन्दगी है जिससे,
मोहब्बत के दीये को तेज़ हवा उसी ने दिया है।

रात गुलज़ार होती रही जिसके एहसास से,
दिन के उजालों को भी उसने अँधेरा किया है।

जब इश्क़ है तो है उससे,
उसने धर्म बीच में लाकर मुझे शर्मिंदा किया है।

जीत जाता मैं भी बाज़ी अपने मोहब्बत की,
अय्याशी नहीं मैंने इश्क़ पाकीज़ा किया है।

जिस्‍म की भूख नहीं मुझे कभी,
दिल का भूखा रोटी से समझौता किया है।

आशिक़ तो हूँ मैं तेरी मुस्कान का, 
खुश रहो तुम हमेशा ख़ुदा से यही दुआ किया है।


Comments

Popular posts from this blog

एक ग़ज़ल "ये ठीक नहीं है"

एक अधूरी किताब

मोहब्बत और धर्म