माँ

सच कहते हैं, कि ज़िन्दगी मिलना ना आसान है।
और जिसने मुझे ज़िन्दगी दी, हाँ वो मेरी माँ है।।

जब पहली बार देखा उसको, उसके चेहरे पे हँसी थी।
आंखों में मेरे आँसू थे, और मेरे रूप में उसे बेटी मिली थी।।

कितनी मासूम थी मैं, मुझे ना पता था कि माँ क्या होती है?
ना हाथ से निवाला उठाया जाता था ना पैरों से खुद चला जाता था।
तब माँ की एहमियत का खुद पता चल जाता था,
रो तो मैं हर बात पे देती थी पर आँसू पोछने बस उसी का हाथ आता था।।

जब बड़ी हुई पता चला रिश्ते बहुत होते हैं दुनिया में, पर सब रिश्ते माँ के बाद ही आते है मेरे लिए इस दुनिया मैं।
मेरे रोने पे खुद रो जाती है वो, मेरे मुस्कुराने पे मुस्कुराती है।
मेरे बिना वो भी एक पल ना रह पाती है,
मैं 2 मिनट भी लेट हो जाऊँ तो टेंशन में आ जाती है।
5 मिनट लेट होते ही मुझे कॉल लगाती है,
मेरे इंतज़ार में खाना वो भी नहीं खाती है,
सब सो जाते हैं मेरे आने तक,
बस एक मेरी माँ ही होती है जिसे नींद नहीं आती है।।

मैंने माँ को बहुत तकलीफ दी है,
पर उसके बिना एक लम्हा भी बिताना भारी सा लगता है।
हाँ ..लड़ती हूँ मैं उनसे,
हर बात पे हक भी जताती हूँ।
क्योंकि जानती हूँ अच्छी तरह,
मुझे छोड़के कहीं नहीं जाएँगी वो औरों की तरह।
माँ तो यारों सभी की एक जैसी होती है।।

डाँटती है हमको,
पर प्यार तो खुद से भी ज़्यादा करती है।
ज़रा सी चोट भी लग जाए अगर मुझे,
तो पूरा घर सर पे उठा लेती है।।

जब मैं बीमार होती हूँ,
तो हर रात मेरे साथ जगके बिताती है।
थक जाती है वो भी पूरे दिन काम करके,
पर फिर भी एक शिकन अपने चेहरे पर नहीं आने देती है।।

ये माँ हीं तो है यारों,
और माँ तो सबकी ग्रेट होती है।।

~साक्षी शर्मा ©

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