एक अधूरी किताब


एक किताब*

इन कोरे कागज़ों को कब तक निहारोगे,
छोड़ चले वो तुम्हे अब कब तक याद आओगे

तन्हा सा ये दिल जान भी बेजान सी है
उन पन्नो पे लिखी वो किताब अब भी अधूरी सी है

उसका हर एक पन्ना जो महज़ एक राज़ ही है, कैसे कहोगे तुम, की वो हमराज़ ही है

जाने कैसे तकलीफों से गुजरे थे, उस किताब में वो पहेलियां अब भी है

वो पैन की स्याही, और स्याही से लिखे ख़त तुम्हारे, मेरे पास मौजूद आज भी है

वो किताब जिसमे ज़िक्र था जो जानों का, उसमे लिखी हर एक बात याद आज भी है

कुछ किस्से अधूरे रह गए, कुछ कहानियां खामोश रह गयी
हमारी भी कुछ ऐसी दास्तां थी, की
वो चले गए पर किताब अधूरी रह गयी

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